
नई दिल्ली: मुगल इतिहास में अकबर का नाम एक ऐसे शासक के रूप में दर्ज है, जिसकी दिलचस्पी केवल युद्ध और राजकाज तक सीमित नहीं थी। कला, संगीत, खेल और रचनात्मक गतिविधियों में भी उसकी खास रुचि थी। खुद पढ़ना-लिखना न जानने के बावजूद वह संगीत और कला की गहरी समझ रखता था। राजकाज की व्यस्तता और तनाव से राहत पाने के लिए उसने अपने आसपास मनोरंजन और रचनात्मक गतिविधियों का एक ऐसा संसार बना रखा था, जो उसे सुकून देता था।
तानसेन का ध्रुपद और दरबार की सुरमई शामें
अकबर को शास्त्रीय संगीत सुनने का गहरा शौक था। उसके दरबार में ध्रुपद शैली के गायन की विशेष जगह थी। नौरत्नों में शामिल तानसेन जब अपनी आवाज में गाते थे तो दरबार का माहौल संगीतमय हो जाता था।
अबुल फजल की किताबों के मुताबिक, अकबर के दरबार में देश-विदेश के 36 बड़े गायक और वादक मौजूद थे। वीणा, रबाब और शहनाई जैसे वाद्य यंत्रों की धुनों के बीच होने वाली संगीत की महफिलें अकबर के पसंदीदा मनोरंजन में शामिल थीं।
वृंदावन की यात्रा और नगाड़े की धुन
अकबर की संगीत में दिलचस्पी केवल दरबारी महफिलों तक सीमित नहीं थी। कहा जाता है कि वह संगीत और आध्यात्मिक शांति की तलाश में वेश बदलकर वृंदावन तक गया था, जहां उसने तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास का गायन सुना।

अकबर को खुद भी संगीत वाद्य बजाने में रुचि थी और नगाड़ा बजाने में उसकी विशेष दिलचस्पी बताई जाती है। फतेहपुर सीकरी में वह खास संगीत महफिलें आयोजित करवाता था, जहां पानी के बीच संगीत की गूंज उसके मनोरंजन का हिस्सा बनती थी।
पचीसी से चौगान तक, खेलों का भी था शौक
मन बहलाने के लिए अकबर केवल संगीत पर निर्भर नहीं रहता था। उसे अलग-अलग तरह के खेल खेलने का भी शौक था। फतेहपुर सीकरी में बना पचीसी का विशाल प्रांगण इसके लिए जाना जाता है।
बताया जाता है कि अकबर पचीसी में दास और दासियों को जीवित गोटियों के रूप में इस्तेमाल करता था। इसके अलावा उसे चौगान यानी पोलो खेलने का भी शौक था। रात में खेल जारी रखने के लिए जलती हुई गेंदों के इस्तेमाल का भी उल्लेख मिलता है।
हाथियों की लड़ाई से कबूतरबाजी तक
अकबर को जानवरों से जुड़े खेल देखने में भी रुचि थी। हाथियों, शेरों और चीतों जैसे जानवरों की लड़ाई देखना उसके मनोरंजन का हिस्सा बताया जाता है। बेकाबू हाथियों को वश में करने में भी उसकी दिलचस्पी थी।
इसके साथ ही उसे कबूतर पालने और उन्हें उड़ाने का शौक था। कबूतरबाजी को वह ‘इश्कबाजी’ कहता था। उसके पास अलग-अलग नस्लों के बड़ी संख्या में कबूतर होने का उल्लेख ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।

शिकार और हथियारों में भी दिलचस्पी
जंगली जानवरों का शिकार अकबर के प्रमुख शौकों में शामिल था। शिकार के लिए चीतों को पालने और उन्हें प्रशिक्षित करने की परंपरा उसके समय में भी थी।
अकबर को हथियारों और सैन्य तकनीक में भी रुचि थी। उसके शासनकाल में ऐसी हल्की तोपों और बंदूकों के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है, जिन्हें जरूरत के मुताबिक एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता था।
किताबें सुनकर बढ़ाता था अपना ज्ञान
अकबर के पास बड़ी संख्या में दुर्लभ पांडुलिपियों वाला पुस्तकालय था। चूंकि वह खुद पढ़ना-लिखना नहीं जानता था, इसलिए विद्वानों से किताबें सुनकर ज्ञान हासिल करता था।
धार्मिक और दार्शनिक विषयों पर चर्चा के लिए उसने 1575 में इबादतखाना बनवाया। यहां अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े विद्वानों के साथ चर्चाएं होती थीं। इन्हीं बौद्धिक और धार्मिक चर्चाओं के दौर में अकबर की धार्मिक विचारधारा में कई प्रयोग देखने को मिले, जिनमें दीन-ए-इलाही का विचार भी शामिल था।
अकबर की जिंदगी के ये पहलू बताते हैं कि उसके शौक केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं थे। संगीत, खेल, शिकार, पशु-पक्षियों और ज्ञान से जुड़ी गतिविधियां उसके दरबारी जीवन और व्यक्तिगत रुचियों का हिस्सा थीं।








