खगोल विज्ञान से लेकर आंदोलनों तक, देश की आवाज का गवाह बना जंतर-मंतर

नई दिल्ली: जंतर-मंतर जो कभी तारों और ग्रहों की चाल समझने के लिए बनाया गया एक वैज्ञानिक यंत्र था, लेकिन समय के साथ मैं देश की जनता की आवाज और बड़े आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बन गया। बता दे कि साल 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मुझे खगोलीय पिंडों और समय की सटीक गणना के लिए बनवाया था। मेरा उद्देश्य ग्रहों, नक्षत्रों और समय की गति को समझना था, लेकिन बदलते वक्त के साथ मेरी पहचान भी बदलती चली गई।

खगोलीय वेधशाला से आंदोलन स्थल तक का सफर

वही 19वीं सदी के आखिरी दशक में जब बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई गईं, तब लुटियंस दिल्ली में स्थित मेरा परिसर जन आंदोलनों का नया ठिकाना बन गया। मैंने दशकों तक देश की राजनीति और समाज में आए बदलावों को करीब से देखा है। मेरी लाल ईंटों ने सत्ता के सामने जनता की आवाज को बुलंद होते सुना है।

अन्ना आंदोलन से किसान और पहलवानों के संघर्ष तक

साल 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत भी मेरी ही जमीन से हुई थी। इसके बाद यह आंदोलन देश की राजनीति में बड़े बदलाव का कारण बना।

मैंने पूर्व सैनिकों की मांगों को लेकर हुए लंबे आंदोलन, किसानों के संघर्ष और महिला पहलवानों के प्रदर्शन को भी देखा। यहां हुए अनगिनत धरने, भाषण और विरोध प्रदर्शन मेरी यादों का हिस्सा हैं।

Gen-Z के प्रदर्शन ने बनाया नया इतिहास

20 जून से शुरू हुआ पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के विरोध में प्रदर्शन मेरे लिए भी अलग अनुभव था। देशभर से आए Gen-Z युवाओं ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाई।

हाथों में किताबें, न्याय की मांग वाली तख्तियां और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर पहुंचे इन युवाओं ने दिखाया कि नई पीढ़ी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना जानती है। वही इस प्रदर्शन में न कोई राजनीतिक झंडा था और न ही पुराना आंदोलन वाला तरीका। युवाओं का मुद्दा साफ था- शिक्षा व्यवस्था में सुधार और न्याय की मांग।

जंतर-मंतर से जुड़ी खास बातें

  • जंतर-मंतर का निर्माण 1724 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था।
  • इसका उद्देश्य खगोलीय गणना और ग्रहों-नक्षत्रों की गति का अध्ययन करना था।
  • दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में भी जंतर-मंतर मौजूद हैं।
  • दिल्ली का जंतर-मंतर करीब 18.5 एकड़ क्षेत्र में फैला है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक है।
  • यहां दुनिया की सबसे बड़ी धूपघड़ी में से एक सम्राट यंत्र मौजूद है।
  • राम यंत्र से सूर्य और अन्य खगोलीय पिंडों की ऊंचाई मापी जाती थी।
  • मिश्र यंत्र पांच अलग-अलग उपकरणों का संयोजन है, जिससे विभिन्न शहरों के समय की गणना की जाती थी।

बदलते समय के साथ बदला आंदोलन का तरीका

इन प्रदर्शनों के दौरान मैंने कई नए बदलाव भी देखे। पहले जहां धरना स्थलों पर पारंपरिक भोजन की व्यवस्था होती थी, वहीं अब ऑनलाइन फूड डिलीवरी की लंबी कतारें दिखाई देने लगीं।

कई बार इससे गंदगी भी फैली और कुछ उपद्रवी गतिविधियां भी देखने को मिलीं, लेकिन युवाओं के मुद्दे और उनकी आवाज इस आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान रही।

आज भी कायम है जंतर-मंतर की पहचान

आज भी मैं वहीं खड़ा हूं। मेरे खगोलीय यंत्र भले ही आधुनिक तकनीक के दौर में पुराने हो चुके हैं, लेकिन जब भी देश का युवा अपने अधिकारों और भविष्य की लड़ाई लेकर यहां आता है, तो मुझे लगता है कि लोकतंत्र की घड़ी आगे बढ़ रही है।

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