
दुनिया में एक ऐसा देश भी है जहां नौकरी पाने के लिए आपकी काबिलियत से ज्यादा आपका वजन मायने रखता है। यह बात सुनने में भले ही थोड़ी अजीब लगे, लेकिन यह सौ फीसदी सच है। एशिया के विकसित देशों में शुमार साउथ कोरिया (दक्षिण कोरिया) में यह अनोखा और कड़ा नियम देखने को मिलता है, जहां मोटे लोगों को नौकरी देने से कतराया जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर इसके पीछे क्या कारण हैं।
योग्यता पर भारी पड़ती मोटापे की बीमारी
- सुंदरता के कड़े मानक (लुकइस्म): साउथ कोरियाई समाज में इंसान के रंग-रूप और शारीरिक बनावट के आधार पर भेदभाव करना बेहद आम है। वहां के कॉर्पोरेट जगत का मानना है कि जो व्यक्ति अपने खुद के शरीर और वजन को कंट्रोल में नहीं रख सकता, वह कंपनी के काम और जिम्मेदारियों को भला कैसे संभालेगा। यही वजह है कि कंपनियों में भर्ती के दौरान मोटे लोगों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
- रिज्यूमे पर फोटो और बॉडी साइज अनिवार्य: भारत और अन्य देशों के विपरीत, साउथ कोरिया में नौकरी के आवेदन के साथ पासपोर्ट साइज फोटो लगाना बेहद जरूरी है। कई कंपनियां तो उम्मीदवारों से उनकी लंबाई और वजन की जानकारी भी मांगती हैं। इंटरव्यू के दौरान स्किल्स के साथ-साथ इस बात पर भी चर्चा की जाती है कि उम्मीदवार कितना फिट और आकर्षक दिखता है।
- ब्यूटी स्टैंडर्ड्स का दबाव: साउथ कोरिया को दुनिया की प्लास्टिक सर्जरी कैपिटल कहा जाता है। वहां समाज ने खूबसूरती के बेहद कड़े पैमाने तय किए हैं, जिसमें महिलाओं के लिए स्लिम या एस-शेप बॉडी और पुरुषों के लिए वी-शेप चेहरा होना जरूरी माना जाता है। वहां अधिक वजन होने को आलस की निशानी समझा जाता है, जिससे लोगों को मानसिक तनाव और सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है।
- नौकरियों में भेदभाव का असर: इस कड़े सामाजिक दबाव के कारण वहां के युवा तनाव और भूखे रहने की बीमारी का शिकार हो रहे हैं। होनहार और शिक्षित होने के बावजूद सिर्फ ज्यादा वजन की वजह से कई युवाओं को रिजेक्शन का सामना करना पड़ता है। कंपनियों का मानना है कि अच्छे दिखने वाले कर्मचारी उनकी ब्रांड वैल्यू को बढ़ाते हैं।
कॉर्पोरेट जगत पर सरकारी चाबुक
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए दक्षिण कोरिया की सरकार ने अब कड़े कदम उठाए हैं। सरकार ने ‘Fair Hiring Practice Act’ में संशोधन किया है। इसके तहत अब 30 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों के लिए आवेदन फॉर्म से फोटो, ऊंचाई, वजन और पारिवारिक बैकग्राउंड की मांग हटाना अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि, इन कानूनी बदलावों के बावजूद इंटरव्यू के दौरान आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह भेदभाव देखने को मिल जाता है।









