पीढ़ियों के बीच बढ़ती खाई: संवाद ही समाधान है

जंतर मंतर पर हाल में हुए आंदोलन ने देश के भीतर एक ऐसी बहस को जन्म दे दिया है, जो सतह पर भले ही एक विरोध-प्रदर्शन जैसी दिखे, लेकिन असल में उसकी जड़ें कहीं गहरी हैं। यह बहस है नई और पुरानी पीढ़ी के बीच लगातार चौड़ी होती जा रही “जेनरेशनल गैप” की, वैचारिक स्तर पर, सामाजिक स्तर पर, जीवनशैली में, शिक्षा के तौर-तरीकों में और यहां तक कि संवाद की भाषा में भी। जिसे आज की पीढ़ी सहज भाव से “स्लैंग” कहकर इस्तेमाल करती है, वही पुरानी पीढ़ी के लिए अक्सर अपरिचित और असहज होता है।

एक कल्चरल शॉक

यह मानना गलत नहीं होगा कि जंतर मंतर से निकली बातें पूरे देश के लिए एक सांस्कृतिक झटके जैसी थीं। आक्रोश का जो स्तर वहां देखने को मिला, उसका अंदाजा शायद किसी को नहीं था। सिवाय खुद नई पीढ़ी के। और जिस तरीके से इस आक्रोश को अभिव्यक्त किया गया, उसने पूरे देश में एक वैचारिक विमर्श छेड़ दिया है। यह विमर्श जरूरी भी है, क्योंकि किसी भी समाज में जब असंतोष सतह पर आता है, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय समझने की जरूरत होती है।

उपलब्धियों से भरा देश

यह कहना पूरी तरह अनुचित होगा कि इस देश में सब कुछ नकारात्मक ही है। भारत ने अपनी एकता और अखंडता के बल पर बहुत कुछ हासिल किया है। समुद्र की गहराइयों से लेकर चंद्रमा की सतह तक, देश ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित की है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर नई पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी से अलग सोच रखती है। एक प्रगतिशील समाज और राष्ट्र हमेशा आगे की ओर देखता है, और यही स्वाभाविक प्रक्रिया है।

जो गलत हुआ, वह गलत था

जंतर मंतर पर बच्चों के साथ जो व्यवहार हुआ, वह निश्चित रूप से गलत था और इसकी जितनी भी आलोचना हो, वह जायज है। लेकिन इसके साथ ही एक और पहलू पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। इस पूरे प्रकरण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जिस तरह की अभद्र और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ, वह चिंता का विषय है। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, विरोध जताने का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन असहमति की आड़ में व्यक्तिगत गरिमा को ठेस पहुंचाना और गाली-गलौज की भाषा अपनाना किसी भी सभ्य समाज और परिपक्व लोकतंत्र की पहचान नहीं हो सकती। पद चाहे किसी का भी हो, संवाद की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। यह न सिर्फ राजनीतिक शालीनता का सवाल है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि आक्रोश को अभिव्यक्त करने के तरीकों पर नई पीढ़ी को आत्ममंथन करने की जरूरत है।

इसी संदर्भ में जब प्रधानमंत्री मोदी ने यह कहा कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण को माफ कर दिया है, तो यह एक बड़ा और सकारात्मक कदम है। यह उदारता इस बात का संकेत देती है कि इस विवाद को अब पीछे छोड़कर देश को आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जाना चाहिए। नेतृत्व की यही परिपक्वता होती है कि वह टकराव को बढ़ाने के बजाय संवाद और समाधान की राह चुने।

टकराव नहीं, टेक्नोलॉजी चाहिए

इस देश के नौजवानों में जो ऊर्जा है, उसका इस्तेमाल राष्ट्र की तरक्की के लिए होना चाहिए, वह भी निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ। आज का भारत टकराव नहीं, टेक्नोलॉजी चाहता है। आपसी मतभेदों को अब समाप्त करने का समय आ गया है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह नौजवानों को गले लगाए, उनके मुद्दों को गंभीरता से समझे और उनका समाधान निकाले। लेकिन इसके साथ ही नौजवानों को भी उतने ही संयम और सब्र की आवश्यकता है, ताकि उनकी बात पूरी ताकत और प्रभाव के साथ रखी जा सके, न कि आवेश में आकर उसका असर कमजोर पड़ जाए।

अविश्वास की दरार पाटनी होगी

समाज, सरकार और सियासत, तीनों को मिलकर इस अविश्वास की दरार को पाटने के लिए सकारात्मक पहल करनी होगी। यह जिम्मेदारी किसी एक पक्ष की नहीं है। नई पीढ़ी को अपनाना, उसे समझना और उसके साथ निरंतर संवाद बनाए रखना, यही वह रास्ता है जिससे यह खाई पाटी जा सकती है। पीढ़ियों के बीच का यह अंतर स्वाभाविक है, लेकिन अगर संवाद जीवित रहे, तो यही अंतर देश की ताकत बन सकता है, कमजोरी नहीं।

अंततः यह देश हमेशा उन क्षणों में मजबूत हुआ है, जब मतभेदों के बावजूद संवाद का रास्ता खुला रखा गया। यही समय है कि इस अनुभव से सीख लेकर आगे बढ़ा जाए।बिना किसी पक्ष को नीचा दिखाए, बिना किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाए, और एक साझा भविष्य की दिशा में मिलकर काम करते हुए।

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