
ग्लेशियर पृथ्वी के विशाल बर्फीले भंडार हैं, जो वर्षों तक जमा होती बर्फ के दबाव से बनते हैं। भारी वजन के कारण ये धीरे-धीरे आगे की ओर खिसकते हैं। जलवायु को संतुलित रखने और जीवन के लिए पानी उपलब्ध कराने में इनकी अहम भूमिका है। पृथ्वी के करीब 10 प्रतिशत हिस्से यानी लगभग 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ग्लेशियर फैले हुए हैं।
कैसे बनते हैं ग्लेशियर?
पहाड़ी और बेहद ठंडे इलाकों में जब हर साल पिघलने वाली बर्फ की तुलना में नई बर्फबारी अधिक होती है, तब ग्लेशियर का निर्माण शुरू होता है। समय के साथ पुरानी बर्फ पर नई बर्फ का दबाव बढ़ता जाता है। इससे बर्फ सख्त बर्फीले क्रिस्टल और चट्टानी मलबे के साथ ठोस रूप लेने लगती है।

जब बर्फ का यह जमाव काफी भारी हो जाता है तो गुरुत्वाकर्षण के कारण यह बर्फीली नदी की तरह बेहद धीमी गति से ढलान की ओर बढ़ने लगता है। दुनिया भर में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 2 लाख से पौने 3 लाख तक ग्लेशियर मौजूद हैं।
कहां-कहां मौजूद हैं ग्लेशियर?
अगर अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की विशाल बर्फीली चादरों को अलग कर दिया जाए, तो दुनिया के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के ग्लेशियर करीब 7 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
भौगोलिक वितरण की बात करें तो पृथ्वी की करीब 91 प्रतिशत बर्फ अंटार्कटिका में केंद्रित है, जबकि लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा ग्रीनलैंड में है। बाकी बर्फ एशिया के हिमालय, उत्तरी और दक्षिण अमेरिका तथा यूरोप के पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद है।
मीठे पानी का बड़ा भंडार हैं ग्लेशियर
ग्लेशियर दुनिया के साफ और मीठे पानी का लगभग 69 से 70 प्रतिशत हिस्सा अपने अंदर समेटे हुए हैं। एशिया की प्रमुख नदियां जैसे गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र इन्हीं से मिलने वाले पानी के कारण साल भर बहती रहती हैं।
यही वजह है कि Glaciers and Freshwater का महत्व केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनका सीधा संबंध करोड़ों लोगों की पानी की जरूरतों से है।
पृथ्वी का तापमान नियंत्रित करने में भी अहम भूमिका
ग्लेशियरों की चमकीली सफेद बर्फ सूर्य की तीखी किरणों को परावर्तित करके वापस अंतरिक्ष में भेजती है। इसे एल्बेदो प्रभाव कहा जाता है। इस प्रक्रिया के जरिए पृथ्वी के तापमान को एक निश्चित सीमा में नियंत्रित रखने में मदद मिलती है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ रहा खतरा
वैश्विक स्तर पर बढ़ता तापमान और प्रदूषण ग्लेशियरों के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। बर्फ तेजी से पिघलने के कारण ऊंचे पहाड़ों पर अस्थायी और कमजोर बर्फीली झीलें बन रही हैं।
जब इन झीलों में क्षमता से अधिक पानी भर जाता है या ये अचानक टूट जाती हैं, तो निचले इलाकों में भयानक बाढ़ आ सकती है। चमोली, केदारनाथ और नेपाल में हुई विनाशकारी त्रासदियां इस बात को दिखाती हैं कि ग्लेशियरों का असंतुलन कितना खतरनाक हो सकता है।









