“जीजा ने सच में नहीं, सपने में छेड़ा था”, साली के बयान के बाद एयरफोर्स कर्मी को मिली 7 साल बाद राहत…

नाबालिग साली से छेड़छाड़ के आरोप में फंसे एयरफोर्स कर्मी को करीब सात साल बाद अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया। इस मामले में पीड़िता ने अदालत में बयान देते हुए कहा कि उसे दवाई के असर में एक सपना आया था, जिसमें उसने अपने जीजा को अपने साथ गलत व्यवहार करते हुए देखा। बाद में उसे समझ आया कि वास्तव में ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

Uttar-Pradesh: कानपुर जिले के बिठूर क्षेत्र से एक हैरान कर देने वाला मामला सामना आया हैं। जहां एक भारतीय वायुसेना के एक कर्मी को करीब 7 साल बाद बड़ी राहत मिली है। यह मामला उस समय सामने आया था जब उनकी साली ने उन पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। मामले की जांच और सुनवाई लंबे समय तक चलती रही।

बता दें, नाबालिग साली से छेड़छाड़ के आरोप में फंसे एयरफोर्स कर्मी को करीब सात साल बाद अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया। इस मामले में पीड़िता ने अदालत में बयान देते हुए कहा कि उसे दवाई के असर में एक सपना आया था, जिसमें उसने अपने जीजा को अपने साथ गलत व्यवहार करते हुए देखा। बाद में उसे समझ आया कि वास्तव में ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

बता दें, जानकारी के अनुसार बिठूर क्षेत्र के रहने वाले एयरफोर्स कर्मी के खिलाफ नौबस्ता थाने में उनकी नाबालिग साली से छेड़छाड़ का मामला दर्ज कराया गया था। शिकायत के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और उन्हें 19 दिन तक जेल में भी रहना पड़ा था। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और करीब सात वर्षों तक इसकी सुनवाई चलती रही।

वहीं, सुनवाई के दौरान जब पीड़िता का बयान दर्ज किया गया तो उसने कहा कि उसे दवाई के नशे में सपना आया था कि उसके जीजा ने उसे पकड़ लिया है। बाद में उसे एहसास हुआ कि यह केवल सपना था और वास्तविकता में ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी।

मामले में पीड़िता के पिता और बड़ी बहन ने भी अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने भ्रम में आकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि उस समय उन्हें लगा कि वास्तव में कोई घटना हुई है, इसलिए उन्होंने केस दर्ज कराया।

विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) की अदालत ने पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों को आधार बनाते हुए एयरफोर्स कर्मी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के खिलाफ आरोप साबित नहीं होते।

इस पूरे मामले में यह भी सामने आया कि जांच के दौरान कई स्तरों पर लापरवाही हुई और एक भ्रम को वास्तविक घटना मान लिया गया। इस वजह से एक निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मानसिक, सामाजिक और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

करीब सात साल तक चले इस मुकदमे के बाद अदालत के फैसले से आरोपी को राहत मिली, लेकिन इस मामले ने न्यायिक प्रक्रिया और जांच की गंभीरता को लेकर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

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