अपनों की बगावत ने ढहा दिए सियासी किले, जानें 10 साल में किन 4 राज्यों के बदल गए समीकरण, पढ़े पूरी खब़र…

पिछले 10 सालों में भारत के 4 बड़े राज्यों की राजनीति बदल गई। शिवसेना, एनसीपी, सपा, लोजपा और एआईएडीएमके जैसे क्षेत्रीय दल अपनों की बगावत के कारण टूट गए।

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा हमेशा से बेहद मजबूत रहा है, लेकिन पिछले एक दशक का इतिहास गवाह है कि कई ताकतवर क्षेत्रीय दल बाहरी चुनौतियों से नहीं, बल्कि अपनों की बगावत और घरेलू कलह की वजह से ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में हुए पांच बड़े सियासी घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया कि सत्ता और विरासत की जंग कितनी बेरहम होती है। इस अंदरूनी बगावत ने न सिर्फ पार्टियों को तोड़ा, बल्कि राज्यों के पूरे राजनीतिक समीकरण को ही पलट कर रख दिया।

इस सियासी उलटफेर का सबसे बड़ा केंद्र महाराष्ट्र रहा, जहां दो पारंपरिक और मजबूत दलों में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर ही संकट आ गया। शिवसेना के कद्दावर नेता एकनाथ शिंदे ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए न सिर्फ उद्धव ठाकरे को सत्ता से बेदखल किया, बल्कि कानूनी लड़ाई जीतकर पार्टी का नाम और तीर-कमान का चुनाव चिन्ह भी अपने गुट के नाम कर लिया। ऐसा ही कुछ एनसीपी में भी देखने को मिला, जहां चाचा शरद पवार के खिलाफ भतीजे अजीत पवार ने मोर्चा खोल दिया। नतीजा यह हुआ कि पार्टी का नाम और ‘घड़ी’ का सिंबल अजीत गुट के पास चला गया और शरद पवार को अपनी ही बनाई पार्टी में हाशिए पर आना पड़ा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति भी इस पारिवारिक और राजनीतिक जंग से अछूती नहीं रही। देश के सबसे बड़े सूबे में समाजवादी पार्टी के भीतर राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच हुआ वर्चस्व का विवाद जगजाहिर है। चाचा-भतीजे की इस सियासी लड़ाई ने लंबे समय तक सपा संगठन को झकझोर कर रखा। हालांकि, लंबी रस्साकसी के बाद अखिलेश यादव ने न केवल संगठन बल्कि पार्टी के मुख्य सिंबल ‘साइकिल’ पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।

इसी तरह बिहार की सियासत में मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले दिवंगत नेता रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी लोक जनशक्ति पार्टी भी बगावत की भेंट चढ़ गई। यहां बेटे चिराग पासवान और चाचा पशुपति कुमार पारस के बीच पार्टी की विरासत को लेकर ऐसी जंग छिड़ी कि पार्टी दो धड़ों में बंट गई। दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में भी अम्मा (जयललिता) के निधन के बाद एआईएडीएमके में ओ. पनीरसेल्वम और ई. पलानीस्वामी के बीच नेतृत्व को लेकर लंबी और तीखी अदालती लड़ाई चली, जिसमें आखिरकार पलानीस्वामी पार्टी के निर्विवाद सर्वेसर्वा बनकर उभरे। इन तमाम घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए बाहरी विरोधियों से ज्यादा खतरनाक घर के भीतर सुलग रही बगावत की चिंगारी होती है।

Related Articles

Back to top button