बरेली को ‘रुद्रावनम’ देने वाले तेज़तर्रार IAS मनिकंडन रातों-रात हटाए गए, BDA उपाध्यक्ष पद से प्रतीक्षारत; दबाव की चर्चाएँ तेज़

बरेली। बरेली विकास प्राधिकरण (BDA) के उपाध्यक्ष रहते हुए शहर के कायाकल्प की नई इबारत लिखने वाले तेज़तर्रार IAS अधिकारी डॉ. मनिकंडन ए. को अचानक पद से हटाकर प्रतीक्षारत कर दिए जाने से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है। शासन ने उनके स्थान पर भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी सौम्या पांडेय को BDA का नया उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। इस आकस्मिक फेरबदल के बाद से बरेली में दबाव की राजनीति को लेकर चर्चाओं का बाज़ार गर्म है।

बुलडोज़र एक्शन ने दिलाई थी प्रदेशभर में पहचान

डॉ. मनिकंडन ने पिछले वर्ष बरेली में हुए सांप्रदायिक दंगों के आरोपियों के अवैध निर्माणों पर बुलडोज़र चलाने की सख्त कार्रवाई कर पूरे प्रदेश में सुर्खियाँ बटोरी थीं। उनकी यह कार्रवाई न केवल प्रशासनिक सख्ती का प्रतीक बनी, बल्कि इसने उन्हें कई प्रभावशाली लोगों के निशाने पर भी ला खड़ा किया। अवैध अतिक्रमण, विकास योजनाओं में लापरवाही और भूमि अधिग्रहण से जुड़े संवेदनशील मामलों में उनकी अडिग कार्यशैली लगातार कुछ ताकतवर हलकों को असहज कर रही थी।

विकास पुरुष के रूप में बनाई अलग पहचान

अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. मनिकंडन ने बरेली के शहरी विकास को एक नई पहचान दी। उन्होंने रामायण वाटिका, रुद्रावनम पार्क, नाथ कॉरिडोर के शुरुआती विकास, रामगंगा नगर आवासीय योजना, ग्रेटर बरेली मास्टर प्लान, मॉडल कम्पोजिट स्कूल और आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स जैसी कई महत्वाकांक्षी एवं जनोपयोगी परियोजनाओं को धरातल पर उतारा। शहर के विकास में इन ऐतिहासिक कामों की वजह से वे लगातार सुर्खियों में रहे और आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए थे।

प्रशासनिक फेरबदल या राजनीतिक दबाव?

मनिकंडन के रातों-रात हटाए जाने के बाद अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या एक सक्रिय और सख्त छवि वाले अधिकारी का अचानक तबादला मात्र एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, या फिर यह किसी बड़े राजनीतिक दबाव का नतीजा है? बरेली की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है कि अवैध निर्माण और बड़े प्रोजेक्ट्स पर दिखाई गई अनुशासनहीनता के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति ने मनिकंडन के कई शक्तिशाली विरोधी खड़े कर दिए थे।

फिलहाल शासन स्तर पर इस फैसले को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन बरेली की जनता और प्रबुद्ध वर्ग अपने ‘विकास पुरुष’ को इस तरह हटाए जाने को स्तब्धता और आक्रोश के साथ देख रहा है।

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