
दिल्ली यूनिवर्सिटी में देशभर से छात्र बेहतर भविष्य का सपना लेकर पढ़ने आते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को इस उम्मीद के साथ राजधानी भेजते हैं कि वे पढ़ाई पूरी कर सुरक्षित घर लौटेंगे। लेकिन दिल्ली के सत्य निकेतन में हुआ ताजा बिल्डिंग हादसा एक बार फिर राजधानी में इमारतों की सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
सत्य निकेतन में रविवार, 6 सितंबर को छात्रों के लिए PG के तौर पर इस्तेमाल हो रही एक पांच मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई। हादसे में छह लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और राहत-बचाव अभियान के दौरान मलबे में फंसे लोगों की तलाश जारी रही।
छात्रों के बीच मौजूद PG में हुआ हादसा
सत्य निकेतन दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से का वह इलाका है जहां बड़ी संख्या में छात्र PG और किराए के कमरों में रहते हैं। हादसे वाली इमारत भी लड़कों के PG के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी।
हादसे के बाद स्थानीय लोगों ने तुरंत बचाव कार्य शुरू किया। दमकल विभाग को करीब 1:30 बजे सूचना मिली और पुलिस, दमकल, NDRF समेत अन्य एजेंसियां मौके पर पहुंचीं। शुरुआती रिपोर्टों में कई लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका जताई गई थी।
सत्य निकेतन हादसे ने फिर खड़े किए बड़े सवाल
किसी एक इमारत के गिरने को महज हादसा कहकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन राजधानी में पिछले कुछ समय में सामने आए कई बिल्डिंग हादसों ने सवालों को और गंभीर बना दिया है।
सत्य निकेतन की घटना के बाद इमारत की उम्र, निर्माण और सुरक्षा मानकों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्टों में अवैध निर्माण और इमारत में चल रहे निर्माण/मरम्मत कार्य की बात सामने आई है। पुलिस ने मामले में कार्रवाई शुरू कर दी है और जांच जारी है।
जुलाई में रोहिणी में 3 लोगों की मौत
सत्य निकेतन से पहले जुलाई 2026 में दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-16 में निर्माणाधीन चार मंजिला इमारत ढह गई थी। भारी बारिश के बीच हुए इस हादसे में तीन लोगों की मौत हुई थी।
पुलिस के अनुसार, मलबे से तीन लोगों को निकाला गया था, लेकिन बाद में मृतकों की संख्या तीन हो गई। हादसे के बाद FIR दर्ज की गई और इमारत के निर्माण से जुड़े पहलुओं की जांच शुरू हुई।
मई में साकेत के पास 6 लोगों की गई थी जान
30 मई 2026 को साकेत मेट्रो स्टेशन के पास सैदुलाजाब इलाके में एक बहुमंजिला इमारत गिर गई थी। इस हादसे में छह लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे।
यह इलाका PG, कोचिंग सेंटर और छात्रों की मौजूदगी के लिए जाना जाता है। हादसे में मरने वालों में छात्र भी शामिल थे। पुलिस ने मामले की जांच शुरू करते हुए इमारत के मालिक को हिरासत में लिया था।
जुलाई 2025 में वेलकम इलाके में जर्जर इमारत गिरी
दिल्ली के वेलकम इलाके में जुलाई 2025 में एक पुरानी और जर्जर इमारत गिरने की घटना भी सामने आई थी। इस तरह के हादसे राजधानी के पुराने और घनी आबादी वाले इलाकों में मौजूद जर्जर इमारतों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाते रहे हैं।
पहाड़गंज में भी बारिश के बीच हुआ था हादसा
17 मई 2025 को पहाड़गंज में निर्माणाधीन इमारत के बेसमेंट से जुड़ा हादसा सामने आया था। तेज बारिश और आंधी के बीच ढांचे के गिरने से तीन मजदूरों की मौत हुई थी।
ऐसे हादसों में अक्सर निर्माण कार्य, बारिश, कमजोर ढांचे और सुरक्षा इंतजामों को लेकर सवाल सामने आते हैं। लेकिन हादसे के बाद कार्रवाई से आगे बढ़कर क्या पहले से जोखिम वाली इमारतों की पहचान और निगरानी हो रही है, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
मुस्तफाबाद हादसे में गई थी 11 लोगों की जान
अप्रैल 2025 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद के दयालपुर इलाके में चार मंजिला इमारत ढह गई थी। इस हादसे में 11 लोगों की मौत हुई थी और 11 अन्य घायल हुए थे। रिपोर्टों के अनुसार, MCD ने उस इमारत को अनधिकृत बताया था।
इस हादसे ने भी दिल्ली में अनधिकृत निर्माण और भवन सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, निगरानी का भी है
सत्य निकेतन से लेकर रोहिणी, सैदुलाजाब और मुस्तफाबाद तक हुए हादसों को एक साथ देखें तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जोखिम वाली इमारतों की पहचान समय रहते की जा रही है?
अगर किसी इमारत में अवैध निर्माण, अतिरिक्त मंजिल, कमजोर ढांचा या निर्माण संबंधी खामियां हैं तो उन पर कार्रवाई हादसा होने के बाद क्यों सामने आती है? छात्रों और आम लोगों से भरे इलाकों में भवन सुरक्षा की नियमित निगरानी कितनी प्रभावी है?
सत्य निकेतन की घटना ने एक बार फिर इन सवालों को सामने ला दिया है। अब हादसे की जांच के साथ यह भी देखना जरूरी होगा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से क्या कदम उठाए गए थे और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।









