
रिपोर्ट : राज नारायण
बाँदा : देश में माहौल चाहे जितना ख़राब क्यों न हो जाए लेकिन बुन्देलखण्ड के बाँदा में मुहर्रम हिन्दू मुस्लिम सम्प्रदायों के बीच ऐसा समन्वय स्थापित करता है जिसमे मिसाल पूरे विश्व में मिलनी नामुमकिन है। मातमी त्योहार मोहर्रम यू तो मुस्लिम समुदाय का त्योहार है लेकिन पूरे मुल्क में बाँदा एक ऐसा इकलौता ज़िला है जहाँ सही मायनो में मुहर्रम की शुरुआत ही एक ब्राह्मण परिवार ने की थी और आज भी ब्राह्मण रामा जी और लक्ष्मी के इमामबाड़े ही बाँदा के हुसैनियों की पहचान बने हुए हैं। यहाँ मुस्लिम ही नहीं बल्कि 70% हिन्दू हुसैन की अकीदत में सराबोर होकर ढाल और नेज़े निकालते हैं और आग के अलाव में कूदकर अपनी श्रद्धा का प्रदर्शन करते हैं। आइये आपको दिखाते हैं बाँदा में गंगा-जमुनी तहज़ीब का ये अनोखा संगम.
बाँदा में 265 साल पहले मोहर्रम की शुरुवात की थी पुणे से आये एक मराठा परिवार ने, जी हाँ, बाँदा का प्रसिद्द रामा का इमामबाडा ,जिसकी स्थापना की थी एक हिन्दू ब्राह्मण रामा राव ने। रामा का इमामबाडा बाँदा का पहला इमामबाडा था,1765 ईसवी में इसी परिवार की महिला लक्ष्मी और उनके परिजन भाऊराम ने एक दूसरा इमामबाड़ा स्थापित किया जो भाऊराम तय्या के इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है और यहाँ पर मोहर्रम का त्यौहार हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग साथ में मनाते हैं। वो जुलूस में ढाल उठाने की बात हो या आग के अलाव में कूदने की, दोनों ही इस त्यौहार में शरीक होते हैं जो आज के दौर में अपने आप में एक बहुत बड़ी मिसाल है।
सांप्रदायिक एकता की मिसाल बाँदा में मोहर्रम के दस दिनों तक इमाम हुसैन की याद में मातम किया जाता है,इन्ही दिनों मोहम्मद साहब के नवासो का क़त्ल किया गया था,जिसके बाद से मुस्लिम समुदाय इसे मातम के रूप में मनाते चले आ रहे है जिसमे इमाम हुसैन की याद में जगह जगह इमामबाड़ो में ढाल और ताजिया रखकर मातम किया जाता है, इन्ही इमामबाड़ो में बाँदा का सबसे ऐतिहासिक और पुराना है रामा का इमामबाडा, जिसकी स्थापना 1750 में पुणे से आये मराठा ब्राह्मण रामा जी ने की थी, और बाँदा में पहली बार इमाम हुसैन की याद में ढाल उठाई थी,तब से लेकर आज तक रामा के वंशज मुहर्रम के 10 दिन नंगे पैर रहकर,ज़मीन में सोकर और व्रत रखकर इस परंपरा को निभाते चले आ रहे हैं। बाँदा में हिन्दू और मुस्लिम आपस में मिलकर मोहर्र्रम का त्यौहार साथ में मनाते हैं। ऐसा नहीं की रामा जी के वंशज ही यहाँ आते है,बल्कि पूरे देश से मुहर्रम में हज़ारो हुसैन के अकीदतमंद इस इमामबाड़े में अपनी मुरादे लेकर आते है और उनका मानना है की यहाँ पर सारी मुरादे पूरी होती है।









