अकबर-शाहजहां के दौर में कैसे अमीर था मुगल साम्राज्य ? जानें कमाई के बड़े स्रोत

अकबर और शाहजहां जैसे सम्राटों के शासनकाल में मुगल साम्राज्य दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों में शामिल था। ऐतिहासिक अनुमानों के मुताबिक, मुगलकालीन भारत का वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में करीब 22 से 25 फीसदी तक योगदान था। साम्राज्य की विशाल संपत्ति का आधार कृषि, भू-राजस्व, व्यापार और अलग-अलग तरह के कर थे।

17वीं शताब्दी में शाहजहां के शासनकाल के दौरान ऐतिहासिक अनुमानों में उस समय की मुद्रा में मुगल राजस्व 22 करोड़ रुपये से ज्यादा बताया जाता है। 22 करोड़ रुपये को 365 दिनों में बांटने पर औसत करीब 6 लाख रुपये प्रतिदिन बैठता है। हालांकि, इसे आज के 6 लाख रुपये के बराबर समझना सही नहीं होगा, क्योंकि उस दौर की मुद्रा और उसकी क्रय शक्ति आज से काफी अलग थी।

कृषि थी राजस्व की सबसे बड़ी ताकत

मुगल अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि थी। आबादी का बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर था, इसलिए भू-राजस्व साम्राज्य की आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन गया।

अकबर के शासनकाल में उनके राजस्व मंत्री राजा टोडर मल ने आइन-ए-दहसाला प्रणाली लागू की थी। इस व्यवस्था में 10 साल की अवधि में फसल के औसत उत्पादन और कीमत के आधार पर राजस्व निर्धारित किया जाता था। इसका उद्देश्य किसानों से वसूले जाने वाले राजस्व के निर्धारण के लिए एक व्यवस्थित आधार तैयार करना था।

किसानों को आमतौर पर अपनी कृषि उपज का एक हिस्सा राजस्व के रूप में देना पड़ता था। क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार राज्य का हिस्सा उपज के करीब एक-तिहाई से लेकर आधे तक हो सकता था। राजस्व नकद या कृषि उपज के आधार पर भी लिया जा सकता था।

व्यापार से भारत में आती थी सोना-चांदी

मुगल भारत की आर्थिक समृद्धि का आधार केवल कृषि नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने भी साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुगल भारत के पास बड़ा विनिर्माण आधार था। भारतीय कपड़ों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग थी। सूती कपड़ा, बंगाल की मलमल, रेशम, मसाले, नील, चीनी और शोरा भारत से निर्यात होने वाली प्रमुख वस्तुओं में शामिल थे।

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से व्यापारी इन उत्पादों को खरीदने भारत आते थे। इसके बदले बड़ी मात्रा में सोना और चांदी भारत में आती थी, जिससे अर्थव्यवस्था में कीमती धातुओं का प्रवाह बढ़ता था।

मुगल साम्राज्य में कौन-कौन से टैक्स लगते थे?

मुगल राज्य कृषि राजस्व के अलावा कई तरह के कर और शुल्क भी वसूल करता था। इनमें जजिया एक प्रसिद्ध कर था, जो गैर-मुस्लिम प्रजा पर लगाया जाता था। अकबर ने इसे समाप्त कर दिया था, जबकि औरंगजेब ने बाद में इसे फिर से लागू किया।

इसके अलावा व्यापारियों से सीमा शुल्क और पारगमन शुल्क भी लिया जाता था। सड़कों, नदियों और बंदरगाहों के जरिए सामान ले जाने पर अलग-अलग शुल्क लगाए जा सकते थे। इनसे भी शाही खजाने को राजस्व मिलता था।

मुगल हर दिन कितना कमाते थे?

मुगल राजस्व के ऐतिहासिक अनुमान अलग-अलग मिलते हैं, क्योंकि उस दौर के रिकॉर्ड आधुनिक लेखा प्रणाली से सीधे मेल नहीं खाते। शाहजहां के शासनकाल के लिए उपलब्ध एक ऐतिहासिक अनुमान में वार्षिक राजस्व 22 करोड़ रुपये से ज्यादा बताया जाता है।

अगर केवल गणितीय औसत के तौर पर 22 करोड़ रुपये को 365 दिनों में बांटा जाए तो यह करीब 6 लाख रुपये प्रतिदिन बैठता है।

हालांकि, इस आंकड़े को आज के रुपये में 6 लाख रुपये की कमाई समझना भ्रामक होगा। 17वीं शताब्दी में इस्तेमाल होने वाले चांदी और तांबे के सिक्कों की क्रय शक्ति आधुनिक मुद्रा से अलग थी। इसलिए ऐतिहासिक राजस्व को सीधे आज की मुद्रा में बदलकर देखना सावधानी की मांग करता है।

आखिर मुगल साम्राज्य इतना अमीर कैसे था?

मुगल साम्राज्य की आर्थिक ताकत किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं थी। उपजाऊ कृषि भूमि, बड़ी कृषि आबादी, मजबूत कपड़ा और विनिर्माण क्षेत्र, आंतरिक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कारोबार ने मिलकर एक बड़ा आर्थिक आधार तैयार किया।

भू-राजस्व से राज्य को आय का एक महत्वपूर्ण और नियमित स्रोत मिलता था, जबकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जरिए सोना और चांदी भारतीय अर्थव्यवस्था में आती थी। व्यापारियों से लिए जाने वाले कर, सीमा शुल्क और अन्य राजस्व स्रोतों ने शाही खजाने को और मजबूत किया।

यानी मुगलकालीन आर्थिक व्यवस्था किसानों, जमींदारों, कारीगरों, व्यापारियों, बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों को जोड़ने वाली एक व्यापक प्रणाली पर आधारित थी।

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