आगरा की दो बहनों की अवैध हिरासत मामले में हाईकोर्ट सख्त, 25 लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा की दो बालिग बहनों की कथित अवैध हिरासत के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म, जीवनसाथी और रहने का स्थान चुनने का संवैधानिक अधिकार है।

हाईकोर्ट ने दोनों बहनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और उनके पिता को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। यह राशि आठ सप्ताह के भीतर दोनों बहनों को बराबर-बराबर दी जाएगी।

बालिग बहनों ने अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन की बात कही

मामले की सुनवाई के दौरान दोनों महिलाओं, जिनकी उम्र करीब 35 और 20 वर्ष बताई गई है, ने अदालत में बयान दिया कि उन्होंने अपनी इच्छा और मानसिक शांति के आधार पर स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था।

महिलाओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद उनके पिता ने उन्हें घर में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा। हाईकोर्ट ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया।

अनुच्छेद 21 और 25 का दिया हवाला

अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 के तहत प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवन जीने, धर्म चुनने और अपने फैसले लेने का अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता या परिवार को किसी बालिग संतान की स्वतंत्रता छीनने या उसे अपनी इच्छा के खिलाफ रोककर रखने का अधिकार नहीं है।

पिता और दोषी अधिकारियों से वसूली का आदेश

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि में से 50 प्रतिशत हिस्सा पिता से और बाकी 50 प्रतिशत उन दोषी लोक सेवकों से वसूला जा सकता है, जिनकी लापरवाही के कारण अवैध हिरासत जारी रही। इसके अलावा कोर्ट ने पिता को सात दिनों के भीतर दोनों महिलाओं के मूल पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक और अन्य निजी दस्तावेज लौटाने का आदेश दिया है।

पुलिस-प्रशासन पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य की एजेंसियों ने अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक आपराधिक मामले (केस क्राइम नंबर 228/2025) की आड़ में महिलाओं की अवैध हिरासत जारी रहने दी गई।अदालत ने इसे “Executive inaction and constitutional indifference” यानी कार्यपालिका की निष्क्रियता और संवैधानिक उदासीनता बताया।

कोर्ट ने स्थगन संस्कृति पर भी जताई नाराजगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुकदमों में देरी को लेकर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कई बार केस करने वाले ही बार-बार स्थगन मांगते हैं और बाद में सोशल मीडिया पर न्यायिक प्रक्रिया में देरी के लिए अदालतों की आलोचना करते हैं। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी का एक बड़ा कारण मुकदमा करने वाले पक्ष भी होते हैं, जिन्हें इससे फायदा मिलता है।

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