अकबर के साम्राज्य की वो महिला, जिसके इशारों पर चलता था मुगल दरबार, बैरम खान को हटाने में निभाई थी अहम भूमिका

मुगल साम्राज्य का इतिहास आमतौर पर बादशाहों, युद्धों और उनकी विजय गाथाओं के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी इतिहास में एक ऐसी महिला का नाम भी...

नई दिल्ली: मुगल साम्राज्य का इतिहास आमतौर पर बादशाहों, युद्धों और उनकी विजय गाथाओं के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी इतिहास में एक ऐसी महिला का नाम भी दर्ज है, जिसने बिना ताज पहने शाही सत्ता पर गहरा प्रभाव डाला। यह महिला थीं माहम अंगा, जो मुगल बादशाह अकबर की धाय मां थीं। इतिहासकारों के अनुसार, माहम अंगा सिर्फ अकबर की परवरिश करने वाली महिला नहीं थीं, बल्कि उन्होंने एक समय मुगल दरबार की राजनीति को भी काफी हद तक प्रभावित किया था।

अमरकोट से अकबर के दरबार तक का सफर

माहम अंगा के शुरुआती जीवन के बारे में ज्यादा स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन वह हुमायूं के शाही परिवार की भरोसेमंद सदस्य मानी जाती थीं। वर्ष 1542 में जब अकबर का जन्म अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र) में हुआ, तब माहम अंगा को उनकी धाय मां बनाया गया।

मुगल परंपरा में धाय मां का स्थान बेहद सम्मानजनक होता था। उन्हें केवल बच्चे की देखभाल करने वाली महिला नहीं, बल्कि परिवार के बेहद करीबी सदस्य का दर्जा दिया जाता था। माहम अंगा ने बचपन से ही अकबर की परवरिश की और उन्हें शासक बनने के संस्कार दिए। यही वजह थी कि वह अकबर के सबसे भरोसेमंद लोगों में शामिल हो गई थीं।

अकबर के शासन में बढ़ा माहम अंगा का प्रभाव

वर्ष 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई के बाद जब अकबर मुगल सिंहासन पर बैठे, तब उनकी उम्र केवल 13 साल थी। कम उम्र होने के कारण शासन की जिम्मेदारी शुरुआत में अकबर के संरक्षक और सेनापति बैरम खान के हाथों में थी।

हालांकि, समय के साथ माहम अंगा ने शाही दरबार और हरम की राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी। अकबर के साथ उनके करीबी संबंधों का असर साफ दिखाई देने लगा और वह धीरे-धीरे सत्ता के महत्वपूर्ण फैसलों में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगीं।

बैरम खान को हटाने में निभाई अहम भूमिका

बैरम खान उस समय मुगल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक थे। लेकिन दरबार के कई अमीर उनसे असंतुष्ट थे। इतिहासकारों के अनुसार, माहम अंगा ने इस स्थिति का लाभ उठाया और अकबर को यह विश्वास दिलाने में भूमिका निभाई कि अब वह स्वयं शासन संभालने के लिए तैयार हैं।

इसके बाद वर्ष 1560 में अकबर ने बैरम खान को उनके पद से हटा दिया। बैरम खान के हटने के बाद माहम अंगा का प्रभाव मुगल दरबार में और बढ़ गया।

मुगल इतिहास का ‘पेटिकोट शासन’ काल

बैरम खान के हटने के बाद मुगल साम्राज्य में कुछ समय ऐसा भी आया जब शाही हरम की महिलाओं का राजनीतिक प्रभाव काफी बढ़ गया। इतिहासकार इस दौर को कई बार ‘पेटिकोट सरकार’ के नाम से भी संदर्भित करते हैं।

इस समय माहम अंगा, जीजी अंगा और हरम की अन्य प्रभावशाली महिलाओं की भूमिका दरबार में काफी महत्वपूर्ण हो गई थी। बड़े अधिकारियों की नियुक्ति और राजनीतिक फैसलों में उनकी राय को काफी महत्व दिया जाता था।

हालांकि, माहम अंगा के पास आधिकारिक रूप से कोई शासन पद नहीं था, लेकिन अकबर के करीबी होने के कारण उनका प्रभाव इतना अधिक था कि बड़े-बड़े दरबारी भी उनके राजनीतिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे।

इतिहास में दर्ज है माहम अंगा की राजनीतिक ताकत

माहम अंगा का जीवन यह दिखाता है कि मुगल काल में सत्ता सिर्फ सिंहासन पर बैठे बादशाहों तक सीमित नहीं थी। शाही परिवार से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोग भी साम्राज्य की राजनीति को दिशा देने में अहम भूमिका निभाते थे।

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