
केरल के मध्य त्रावणकोर इलाके के कई गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। युवा पढ़ाई और नौकरी के लिए विदेश गए और वहीं बस गए। अब गांवों में ज्यादातर बुजुर्ग माता-पिता, बंद मकान, खाली स्कूल और सूनी सड़कें नजर आती हैं।
पथानमथिट्टा जिले के कुंबनाड गांव में बड़े-बड़े आलीशान घर बने हुए हैं, लेकिन उनकी खिड़कियां बंद हैं और आंगन खाली पड़े हैं। बिजली के खंभों पर लगे मृत्यु-सूचना वाले बोर्ड बताते हैं कि गांव की पुरानी पीढ़ी भी लगातार कम हो रही है।
रिटायर्ड ब्रिगेडियर वर्गीज जैकब बताते हैं कि उनके पूरे मोहल्ले में अब सिर्फ एक तीन साल का बच्चा है। वह कभी-कभी छत पर आकर उन्हें ‘अप्पाचा’ यानी दादा कहकर बुलाता है। वर्गीज कहते हैं कि यही आवाज अब उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशियों में से एक है। उनके दोनों बेटे भी गांव से बाहर रहते हैं।
80 वर्षीय जोसेफ मैथ्यू कुलथंगल 1969 में युगांडा चले गए थे और वर्ष 2000 में वापस लौटे। उनका कहना है कि हर बार घर लौटने पर गांव में पहले से कम लोग दिखाई देते थे। कुछ दशकों में गांव की आबादी आधी से भी कम रह गई है। उन्हें डर है कि कहीं एक दिन यह गांव नक्शे से ही गायब न हो जाए।
पलायन से आई समृद्धि, अब वही बनी संकट
इस इलाके से पलायन की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी। लोग पहले केरल के दूसरे हिस्सों और भारतीय शहरों में गए। बाद में खाड़ी देशों, अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में बसने लगे।
विदेशों से भेजे गए पैसों से यहां बड़े मकान बने। स्कूल, अस्पताल और चर्च खड़े हुए। अंग्रेजी शिक्षा और मिशनरी संस्थानों ने युवाओं के लिए विदेश जाने का रास्ता खोला। 1980 और 1990 के दशक में इस पैसे से इलाके में निर्माण का बड़ा उछाल आया।
लेकिन विदेश गए लोगों के बच्चे अब वहीं के हो गए हैं। उनका अपने पुश्तैनी गांव से भावनात्मक रिश्ता कमजोर पड़ चुका है। वे पारिवारिक कार्यक्रमों में कुछ हफ्तों के लिए आते हैं और फिर वापस चले जाते हैं। गांव के महंगे मकान खाली पड़े रहते हैं।
स्कूलों से गायब हो रहे बच्चे
कुंबनाड जिस कोइपुरम पंचायत में आता है, वहां एक आंगनबाड़ी में केवल 11 बच्चे बचे हैं। कोइपुरम सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में दो दशक पहले करीब 500 विद्यार्थी पढ़ते थे। अब यह संख्या घटकर लगभग 80 रह गई है। निजी स्कूलों की स्थिति भी ऐसी ही है।
पथानमथिट्टा जिले में 60 हजार से ज्यादा मकान साल के अधिकांश समय बंद रहते हैं। औसतन हर स्थानीय निकाय में करीब एक हजार खाली मकान हैं। अकेले एराविपेरूर पंचायत में 2,632 मकान बंद पड़े हैं।
बुजुर्गों का जिला बन रहा पथानमथिट्टा
स्वास्थ्य विभाग की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार जिले की करीब 19 प्रतिशत आबादी 60 वर्ष से अधिक उम्र की है, जबकि छह साल से कम उम्र के बच्चे केवल 6.8 प्रतिशत हैं। जिले की कुल प्रजनन दर घटकर 1.3 रह गई है, जो केरल में सबसे कम है।
कम होती आबादी का असर भविष्य में जिले की विधानसभा सीटों की संख्या पर भी पड़ सकता है। अनुमान है कि जिले के कम से कम पांच प्रतिशत बुजुर्ग अकेले रहते हैं। करीब 10 से 15 प्रतिशत बुजुर्ग केवल अपने जीवनसाथी के साथ रहते हैं, क्योंकि उनके बच्चे विदेशों में बस चुके हैं।
अब पैसा भी बाहर जा रहा
केरल माइग्रेशन सर्वे 2023 के अनुसार पथानमथिट्टा से विदेश जाने वालों की संख्या एक दशक में लगभग 1.41 लाख से घटकर 1.01 लाख रह गई। वापस लौटने वाले प्रवासियों की संख्या भी 1998 के 54,537 से घटकर 2023 में 40,921 रह गई।
प्रति परिवार विदेश से आने वाला पैसा बढ़ा है, लेकिन केरल को मिलने वाली कुल विदेशी रकम में पथानमथिट्टा की हिस्सेदारी 7.2 प्रतिशत से घटकर 4.3 प्रतिशत रह गई। दूसरी ओर, केरल से विदेश भेजी जाने वाली रकम बढ़कर ₹43,378 करोड़ हो गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशों में बस चुके परिवार अब अपनी बचत गांव में लगाने के बजाय पुश्तैनी संपत्तियां बेचकर पैसा विदेश ले जा रहे हैं। इसका असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और रियल एस्टेट बाजार पर पड़ रहा है।
इस बदलाव को एक विशेषज्ञ ने सरल शब्दों में समझाया कि पहले गांवों से लोग गए, अब उनकी संपत्तियां और पैसा भी जा रहा है। कभी पलायन ने इन गांवों को समृद्ध बनाया था, अब वही पलायन इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है।









