
अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे उत्तर प्रदेश पुलिस, एसआईटी (SIT) और राम मंदिर ट्रस्ट की भूमिका पर बेहद गंभीर और कानूनी सवाल खड़े होने लगे हैं। इस मामले में पुलिस ने नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल तो भेज दिया है, लेकिन पर्दे के पीछे से आ रही इनसाइड स्टोरी यह इशारा कर रही है कि इस पूरे महा-घोटाले की जड़ें बेहद गहरी हैं और कार्रवाई की आंच को शीर्ष स्तर तक पहुंचने से रोकने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।
900 डॉलर और 80 लाख रुपये बरामद, फिर भी पुलिस ने नहीं मांगी रिमांड
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जेल भेजे गए आरोपियों के पास से अब तक 80 लाख रुपये कैश और 900 अमेरिकी डॉलर (विदेशी करेंसी) समेत भारी मात्रा में चढ़ावे की रकम बरामद हो चुकी है। इतनी बड़ी रिकवरी होने के बावजूद इस हाई-प्रोफाइल केस की जांच कर रहे सीओ (CO) आशुतोष त्रिपाठी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों और जानकारों में इस बात को लेकर भारी अचरज है कि इतने बड़े करोड़ों के घोटाले में मुख्य कड़ियों को जोड़ने के लिए सीओ आशुतोष त्रिपाठी ने कोर्ट से आरोपियों की पुलिस रिमांड तक नहीं मांगी। बिना रिमांड मांगे और बिना कड़ाई से पूछताछ किए आरोपियों को सीधे जेल भेज दिया गया। सूत्रों और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि सीओ आशुतोष त्रिपाठी को ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का बेहद करीबी माना जाता है, जिसके चलते जांच की दिशा पर सवाल उठ रहे हैं।
ट्रस्ट के पास नहीं है रिकॉर्ड ?
एफआईआर में नामजद किए गए आरोपियों के न तो पिता का नाम दर्ज है और न ही उनके घर का कोई पता लिखा गया है। सवाल यह उठ रहा है कि जो कर्मचारी राम मंदिर के इतने संवेदनशील और वीवीआईपी (VVIP) काउंटरों पर बैठकर करोड़ों का चढ़ावा गिनते थे, क्या ट्रस्ट के पास उनकी सामान्य पुलिस वेरिफिकेशन या पते की जानकारी तक नहीं थी? या फिर जानबूझकर एफआईआर को कमजोर रखा गया है?
चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव पर कार्रवाई क्यों नहीं ?
इस पूरे मामले में विपक्ष के साथ-साथ अब आरोपियों के परिवार वाले भी खुलकर सामने आ गए हैं। गिरफ्तार किए गए आरोपी लवकुश मिश्रा के दादा जगदंबा मिश्रा ने कैमरे पर एक विस्फोटक बयान दिया है। जगदंबा मिश्रा ने सीधा आरोप लगाते हुए कहा, “राम मंदिर ट्रस्ट के बड़ों को बचाने के लिए इन छोटे-छोटे बच्चों और कर्मचारियों को मोहरा बनाकर जेल भेज दिया गया है।”
उन्होंने सीधे तौर पर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, सदस्य अनिल मिश्रा और कर्नाटक के रहने वाले गोपाल राव की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। जनता और पीड़ित परिवारों का भी यही सवाल है कि इतने कड़े सुरक्षा चक्र में बिना शीर्ष पदाधिकारियों की शह या मिलीभगत के इतनी बड़ी चोरी महीनों तक कैसे चलती रही? इसके बावजूद चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपाल राव पर अब तक कोई आंच क्यों नहीं आई है? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘दूध का दूध पानी का पानी’ करने के दावे के बीच, अयोध्या पुलिस की यह सुस्त और संदिग्ध कड़ियां जांच की नीयत को कटघरे में खड़ा कर रही हैं।









