यूपी की दलित राजनीति में वर्चस्व की जंग,मायावती और चंद्रशेखर आजाद में छिड़ा सियासी संग्राम

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में अब एक निर्णायक और खुली जंग छिड़ चुकी है। मेरठ के ललिता गौतम हत्याकांड के बाद हुए हिंसक प्रदर्शनों और सड़क जाम की घटनाओं ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) और आजाद समाज पार्टी (ASP) के बीच के तनाव को सतह पर ला दिया है। बसपा प्रमुख मायावती द्वारा दिए गए तीखे बयानों को सीधे तौर पर चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ ‘अघोषित युद्ध’ माना जा रहा है।

मायावती ने बिना नाम लिए चंद्रशेखर आजाद खेमे पर जोरदार हमला किया है। उन्होंने ‘मगरमच्छ के आंसू’, ‘संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ’ और ‘दलितों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उनके आंदोलनों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। मायावती का तर्क है कि चुनाव नजदीक आते ही विरोधी दल कुछ संगठनों को आगे कर बहुजन समाज को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि ऐसे हिंसक आंदोलनों में जेल जाने और मुकदमे फंसने से न केवल उनका भविष्य बर्बाद होता है, बल्कि पूरा परिवार तबाह हो जाता है।

जवाब में चंद्रशेखर आजाद ने भी मायावती के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उनके शब्दों से उन्हें व्यक्तिगत रूप से ठेस पहुंची है। इस वाकयुद्ध ने यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में दलित वोटों के समीकरण को लेकर BSP और आजाद समाज पार्टी के बीच वर्चस्व की लड़ाई अब चरम पर है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मिशन 2027 की तैयारियों के बीच यह टकराव दलित राजनीति के दो ध्रुवों को पूरी तरह अलग कर रहा है। जहां एक ओर मायावती अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं चंद्रशेखर आजाद आक्रामक आंदोलनों के जरिए युवाओं को लुभाने में जुटे हैं। आने वाले समय में यह लड़ाई उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बड़े समीकरण बदल सकती है।

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