
भारत में कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली का पर्व सुख, समृद्धि और रोशनी का प्रतीक है। इस दिन माता लक्ष्मी, भगवान श्री गणेश और कुबेर महाराज की पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन दीपावली का इतिहास केवल धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। भारतीय इतिहास में इस पर्व का एक दिलचस्प शाही अध्याय भी रहा है। मुगलकाल में भी दीपावली पूरे शाही अंदाज में मनाई जाती थी। इसे ‘जश्न-ए-चिरागा’ के नाम से जाना जाता था। बाबर से लेकर बहादुर शाह जफर के दौर तक मुगल शासन में इस त्योहार को विशेष उत्साह और सांस्कृतिक सौहार्द के साथ मनाने की परंपरा रही।
मुगल किलों में भी मनाया जाता था दीपावली का त्योहार
मुगलकाल में त्योहारों और शाही जीवनशैली का विस्तृत विवरण उस दौर के इतिहासकारों और भारत आए यूरोपीय यात्रियों की रचनाओं में मिलता है। जब मुगलों ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की, तो सम्राट शाहजहां ने दिल्ली को शाहजहानाबाद नाम दिया।
यह शहर अपनी भव्य वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध था। लाल किले में दीपावली का आयोजन भी इसी शाही परंपरा का हिस्सा था। यहां रोशनी और उत्सव की तैयारियां कई महीने पहले से शुरू हो जाती थीं।
महीनों पहले से होती थी मिठाइयों की तैयारी
लाल किले में दीपावली के मौके पर शाही दस्तरख्वान और दरबार के लिए तरह-तरह की मिठाइयां तैयार कराई जाती थीं। इसके लिए आगरा, मथुरा, लखनऊ और भोपाल जैसे शहरों से बेहतरीन हलवाइयों को विशेष रूप से बुलाया जाता था।
मिठाइयों को स्वादिष्ट और शुद्ध बनाने के लिए आसपास के ग्रामीण इलाकों से देसी घी मंगवाया जाता था। इस रोशनी के पर्व को आधिकारिक रूप से मनाने की परंपरा तीसरे मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में वर्ष 1556 में आगरा के किले से शुरू हुई थी। इसके बाद अन्य मुगल शासकों ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
40 गज ऊंचे खंभे पर जलाया जाता था विशाल आकाश दीया
मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल में दीपावली पर रोशनी फैलाने की एक खास परंपरा शुरू हुई, जिसे आकाश दीया कहा जाता था। किले के सबसे ऊंचे स्थान पर करीब 40 गज ऊंचे विशाल बांस के खंभे पर एक बड़ा दीपक लगाया जाता था।
इस विशाल दीये में 100 किलोग्राम से अधिक रुई की बत्ती और भारी मात्रा में सरसों का तेल इस्तेमाल होता था। इसमें तेल भरने और बत्ती संभालने के लिए बड़ी-बड़ी सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता था।
दीपावली की रात जब यह आकाश दीया जलता था, तो इसकी रोशनी लाल किले से लेकर चांदनी चौक के बाजारों तक फैल जाती थी।
लाल किले में होती थी लक्ष्मी पूजा और भव्य आतिशबाजी
मुगल साम्राज्य के अंतिम दौर में बहादुर शाह जफर के समय लाल किले में वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार लक्ष्मी पूजन किया जाता था। पूजा के लिए जरूरी सामग्री चांदनी चौक के प्रसिद्ध कटरा नील बाजार से खरीदी जाती थी।
वहीं, दीपावली पर होने वाली आतिशबाजी की व्यवस्था जामा मस्जिद के पीछे स्थित पाइवालान क्षेत्र के प्रसिद्ध आतिशबाजों द्वारा की जाती थी। शाहजहां के दौर में महल की रानियां, बेगमें और युवा शहजादे आतिशबाजी का नजारा देखने के लिए कुतुब मीनार तक जाया करते थे।
पहला दीया: तांत्रिक साधना और काले जादू से बचाव की मान्यता
साल 1885 में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक ‘बज्म-ए-आखिर’ में मुंशी फैजुद्दीन देहलवी ने लाल किले में मनाई जाने वाली दिवाली का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने इस उत्सव को पहला, दूसरा और तीसरा दीया के रूप में बताया है।
पहले दीये यानी छोटी दिवाली के दिन तांत्रिक साधना और काले जादू का भय माना जाता था। इससे बचाव के लिए किले में कड़े सुरक्षा नियम लागू किए जाते थे। किसी भी कर्मचारी को किले से बाहर जाने या बाहरी व्यक्ति को अंदर आने की अनुमति नहीं होती थी।
यहां तक कि बाहर से सब्जियां भी नहीं मंगाई जाती थीं। अगर बैंगन, कद्दू या चुकंदर जैसी सब्जियां पकानी होती थीं, तो उन्हें अच्छी तरह छीलकर और जांचने के बाद ही इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा महल की महिलाओं को किसी तांत्रिक प्रभाव से बचाने की मान्यता के तहत किया जाता था।
तीसरा दीया: तुलादान और गरीबों में बांटा जाता था दान
तीसरे दीये यानी मुख्य दीपावली के दिन दरबार में सम्राट का सोने, चांदी और कीमती रत्नों से तुलादान किया जाता था। पूजा के बाद इस धन को गरीब और जरूरतमंद लोगों में बांट दिया जाता था।
इसके अलावा बादशाह की ओर से राज्य की खुशहाली के लिए सतनजा, काली भैंस, सरसों का तेल और काले कंबल बतौर सदका गरीबों को दिए जाते थे।
रात होते ही पूरा महल दीयों की रोशनी से जगमगा उठता था। दासियां और बांदियां घर-घर जाकर खील-बताशे, मिट्टी के छोटे खिलौने और गन्ने बांटती थीं। शहजादे और शहजादियां भी अपने हाथों से मिट्टी के छोटे घर बनाते थे। इन घरों में खील-बताशे रखकर उनके सामने दीपक जलाए जाते थे।
शहनाई और नगाड़ों से गूंजता था शाही नौबतखाना
दीपावली के शाही आयोजन में संगीत का भी खास इंतजाम होता था। शाही नौबतखाने में शहनाई, नगाड़े और ढोल जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों से मंगल धुनें बजाई जाती थीं। इस संगीत को ‘नौबत’ कहा जाता था।
महल के कोनों में नींबू बंधे गन्ने सजाए जाते थे, जिन्हें अगले दिन सुबह सेवकों में बांट दिया जाता था।
इस आयोजन का एक खास आकर्षण ‘रथ बान’ भी होता था। शाही रथ खींचने वाले सांडों के खुरों पर मेहंदी लगाई जाती थी और उनके गले में सुरीली घंटियां बांधी जाती थीं। सम्राट के सवार होने से पहले सांडों की पीठ पर सोने-चांदी के तारों से कढ़ी हुई कीमती पोशाक बिछाई जाती थी।
रंग महल में हजारों दीयों से होती थी रोशनी, दरबारियों देते थे नजराना
दीपावली के अवसर पर लाल किले का रंग महल हजारों दीयों और झाड़-फानूसों की रोशनी से जगमगा उठता था। इस मौके पर दरबारी, मनसबदार और प्रांतीय सूबेदार अपनी हैसियत के अनुसार बादशाह को कीमती उपहार भेंट करते थे।
मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में दीपावली की रात चौसर यानी जुआ खेलने की विशेष परंपरा भी थी।
मोहम्मद शाह रंगीला के दौर में मशहूर थी ‘रंगीला की दिवाली’
मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला के शासनकाल में चांदनी चौक की दीपावली ‘रंगीला की दिवाली’ के नाम से मशहूर थी। इस दिन बादशाह स्वयं शाही लश्कर के साथ बाजारों की रौनक देखने निकलते थे।
पूरे चांदनी चौक में रोशनी और उत्सव का माहौल रहता था। आम जनता भी इस पर्व को उत्साह और सांप्रदायिक सौहार्द के साथ मनाती थी। इस तरह मुगलकाल में दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि शाही परंपरा, रोशनी, संगीत और सांस्कृतिक मेलजोल का भव्य आयोजन हुआ करती थी।









