
इटावा। 22 नवंबर 1939 की रात इटावा जिले के सैफई गांव में मूर्ति देवी और सुघ सिंह के घर एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया मुलायम सिंह यादव। मुलायम के पिता सुघ सिंह यादव एक किसान थे और उनके पास करीब चार-पांच बीघा जमीन थी, जिस पर वे खेती किया करते थे। इसके साथ ही उनके पास कुछ गाय-भैंस भी थीं। मुलायम को कुश्ती लड़ना काफी पसंद था, इसलिए वे आसपास के मेलों में होने वाली कुश्तियों में भी लड़ने के लिए जाते थे।
15 साल की उम्र में हो गई थी शादी
1952 में जब मुलायम छठी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी पड़ोस के गांव में रहने वाली मालती देवी से उनकी शादी करा दी गई। शादी के वक्त मुलायम की उम्र मात्र 15 साल थी। उन दिनों सोना-चांदी देने का ज्यादा चलन नहीं था, इसलिए मुलायम को शादी के दहेज में एक भैंस मिली।
नहर टैक्स आंदोलन से जुड़े
उन दिनों सरकार ने नहर के पानी पर टैक्स बढ़ा दिया था, जिसका राम मनोहर लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी विरोध कर रही थी। सैफई गांव के ज्यादातर लोग भी इस पार्टी से जुड़े हुए थे। इसलिए सैफई गांव के लोग सुबह प्रभात फेरी निकालते, जिसमें डॉक्टर लोहिया जिंदाबाद के नारे लगाए जाते थे। इसी आंदोलन में मुलायम सिंह यादव भी शामिल हो जाते हैं। टैक्स के विरोध में बड़ी तादाद में ग्रामीण लोग अपनी गिरफ्तारियां दे रहे थे और मुलायम भी इन्हीं में से एक थे। लेकिन पेशी के दौरान उनकी उम्र 18 साल से कम थी, जिसके चलते मजिस्ट्रेट ने उन्हें वापस गांव भेज दिया। इससे मुलायम काफी निराश हुए। लोहिया के भाषणों से प्रभावित मुलायम नहर रेट आंदोलन की रैलियों में सबसे आगे दिखते थे।
ताश खेलकर जीती साइकिल
1956 में मुलायम ने करहल के जैन इंटर कॉलेज में एडमिशन ले लिया। मुलायम अपने परिवार के पहले सदस्य थे, जिन्होंने 10वीं पास की थी। मुलायम के परिवार की आर्थिक हालत देखकर जैन कॉलेज के प्रिंसिपल ने उनकी फीस माफ कर दी। लेकिन अभी भी मुलायम के पास एक चीज की कमी थी और वह थी साइकिल। एक दिन मुलायम ने देखा कि पड़ोस के गांव में कुछ लोग ताश खेल रहे थे। यहां जीतने वाले को एक व्यापारी ब्रांड की नई साइकिल मिलने वाली थी। इसलिए मुलायम भी ताश खेलने के लिए बैठ गए। उस दिन किस्मत ने साथ दिया और मुलायम यह गेम जीत गए और उन्हें इनाम के तौर पर साइकिल मिल गई।
कॉलेज प्रेसिडेंट बनने से बने राजनीतिक कनेक्शन
1959 में 12वीं पास करने के बाद मुलायम ने इटावा के केके डिग्री कॉलेज के बीए कोर्स में एडमिशन ले लिया। स्कूल के दिनों से ही मुलायम को राजनीति में इंटरेस्ट था, इसलिए उन्होंने केके डिग्री कॉलेज में छात्र संघ चुनावों में प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ा और जीत भी गए। कॉलेज प्रेसिडेंट बनने के बाद मुलायम ने कॉलेज के एनुअल फेस्ट में यूपी के विधायकों और मंत्रियों को इनवाइट करना शुरू कर दिया, जिससे उनके राजनीतिक कनेक्शन बनने लगे।
बीटीसी के बाद बने शिक्षक
1962 में मुलायम सिंह यादव बैचलर ऑफ टीचिंग कोर्स करने के लिए शिकोहाबाद चले गए, जहां उन्होंने एक साल तक टीचर की ट्रेनिंग की। इसे पूरा करने के बाद उन्हें जैन इंटर कॉलेज में ही टीचर की नौकरी लग गई, जहां उन्होंने अपनी इंटर पास की थी।
कुश्ती में हार के बाद बने राजनीतिक शिष्य
इधर एक लोकल कुश्ती प्रोग्राम में जसवंत नगर के विधायक नत्थू सिंह एज अ गेस्ट इनवाइट किए गए। इत्तेफाक से इस प्रोग्राम में मुलायम सिंह यादव भी कुश्ती लड़ने के लिए आए हुए थे। यहां हुई एक कुश्ती में मुलायम ने एक भारी-भरकम पहलवान को पटकनी दे दी। विधायक नत्थू सिंह इससे बड़े प्रभावित हुए कि एक टीचर भी गजब की पहलवानी लड़ सकता है। इस तरह मुलायम की परफॉर्मेंस, उनकी राजनीतिक अवेयरनेस और समझ से विधायक नत्थू सिंह काफी प्रभावित हुए और यहीं से वे मुलायम के राजनीतिक गुरु बन गए और उन्हें ग्रूम करने लगे। अब वे जहां भी जाते, मुलायम सिंह यादव को अपने साथ ले जाते थे।
लोहिया से मुलाकात ने बदली दिशा
15 अगस्त 1966 के दिन राम मनोहर लोहिया ने भारत बंद का ऐलान किया। इस दौरान लोहिया एक रैली के लिए इटावा आए। तभी मुलायम को पहली बार उनसे मिलने का मौका मिला। लोहिया से मीटिंग के बाद मुलायम एक एक्टिव समाजवादी कार्यकर्ता बन गए। इधर मुलायम के गुरु नत्थू सिंह ने घोषणा कर दी कि वे जसवंत नगर से चुनाव नहीं लड़ेंगे। इस तरह 1967 में मुलायम सिंह यादव को लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जसवंत नगर का टिकट मिल गया।
पहली जीत, बने सबसे कम उम्र के विधायक
मुलायम का मुकाबला कांग्रेस के एडवोकेट लखन सिंह से था। चुनाव प्रचार के लिए मुलायम को ट्रैक्टर नहीं मिला, तो उन्होंने साइकिल, बुलेट और बैलगाड़ियों से ही अपना प्रचार शुरू कर दिया। अपने भाइयों के साथ मिलकर मुलायम गांवों-कस्बों में साइकिल से प्रचार करने निकल पड़े। प्रचार के दौरान मुलायम सिंह यादव अपना शॉल फैलाकर ‘एक वोट एक नोट’ मांगा करते थे। नतीजा यह हुआ कि मुलायम सिंह यादव पहली बार में ही भारी बहुमत से जीते और विधायक बन गए। इस वक्त मुलायम की उम्र मात्र 28 साल थी और वे यूपी विधानसभा पहुंचने वाले सबसे कम उम्र के विधायक थे।
बखीवर कांड ने बदली राजनीतिक छवि
इसी बीच 1968 में एक ऐसी बड़ी घटना हुई, जिसने मुलायम के राजनीतिक स्टैंड को सेव कर दिया। इटावा के बखीवर कस्बे में रघुराज नाम के इंस्पेक्टर ने एक दलित महिला को थाने में बुलाया और उसके सारे कपड़े उतरवा दिए। जब मुलायम को इस घटना की जानकारी मिली, तो वे थाने पहुंच गए और प्रोटेस्ट करने लगे। इस दौरान मुलायम अपने साथियों के साथ थाने की दीवार पर चढ़ गए। उग्र भीड़ को देखकर पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में मुलायम बाल-बाल बचे, लेकिन उनके चार साथी मारे गए।
1969 में मिली हार
1969 के यूपी चुनाव में मुलायम के सामने कांग्रेस के विषंभर सिंह यादव खड़े हुए, जिन्होंने मुलायम को करीब 5277 वोटों से हरा दिया। यहां बताना जरूरी है कि राजनीति में एक्टिव होने के बाद भी मुलायम ने टीचर की नौकरी नहीं छोड़ी। अपनी पढ़ाई जारी करते हुए उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी के बीआर कॉलेज से एमए की डिग्री शुरू कर दी।
चौधरी चरण सिंह के करीब आए
डॉ. लोहिया के निधन के बाद मुलायम सिंह यादव चौधरी चरण सिंह के करीब आ गए। चौधरी चरण सिंह के संपर्क में आने पर मुलायम ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी छोड़ दी और चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल यानी बीकेडी में शामिल हो गए। इधर 1973 में मुलायम की एमए की डिग्री पूरी हो चुकी थी, जिसके बाद उन्हें जैन इंटर कॉलेज में प्रमोशन देकर लेक्चरर बना दिया गया। वे छात्रों को पॉलिटिकल साइंस पढ़ाते थे।
अखिलेश का जन्म
इसी साल मुलायम एक बेटे के पिता बने। उनकी पत्नी मालती देवी ने 1 जुलाई 1973 को एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया अखिलेश।
1974 में दोबारा जीत
1974 में यूपी में दोबारा चुनाव हुए। इस बार मुलायम सिंह यादव भारतीय क्रांति दल की टिकट पर जसवंत नगर से चुनाव लड़े और जीत गए। लेकिन इसके अगले ही साल 1975 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी। विपक्ष के नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ रैलियां कर रहे थे, इसलिए विपक्ष के नेताओं को पकड़-पकड़कर जेल में डाला जाने लगा।
इसी दौरान पुलिस मुलायम सिंह यादव को अरेस्ट करने के लिए उनके घर पहुंची। इस वक्त मुलायम एक शादी समारोह में गए हुए थे, इसलिए वे गिरफ्तारी से बच गए। लेकिन जब वे देर रात शादी से वापस घर लौटे, तो घरवालों ने उन्हें किचन में छुपा दिया। सुबह तड़के मुलायम सिंह यादव अंडरग्राउंड हो गए। हालांकि वे ज्यादा दिन तक छिप नहीं सके और पुलिस ने उन्हें अरेस्ट कर लिया।
इमरजेंसी में 19 महीने जेल
26 जून 1975 को जब देश में इमरजेंसी लगी, तो अगले ही दिन मुलायम भी गिरफ्तार हो गए। मुलायम ने पूरे 19 महीने इटावा की जेल में काटे। 1977 में इमरजेंसी हट जाती है और 22 जनवरी 1977 को मुलायम सिंह यादव को भी जेल से छोड़ दिया जाता है। जेल से रिहा होते ही मुलायम सिंह यादव चुनाव प्रचार में जुट गए। इमरजेंसी में गिरफ्तारी के कारण मुलायम सिंह यादव गांव-गांव में लोकप्रिय हो चुके थे। उन्हें सुनने के लिए हजारों किसानों की भीड़ बड़ी संख्या में उनकी रैली में पहुंचने लगी।
तीसरी बार बने विधायक, बने मंत्री
1977 के यूपी चुनाव में उन्हें जनता पार्टी से जसवंत नगर के लिए टिकट मिल गया। यहां से जीतकर वे तीसरी बार विधायक बने। इस बार यूपी में जनता पार्टी को भी भारी बहुमत मिला और वह 425 सीटों में से 352 सीटें जीतने में कामयाब रही। इसी के साथ जनता पार्टी के रामनरेश यादव यूपी के चीफ मिनिस्टर बने, जो यूपी के पहले पिछड़े वर्ग से आने वाले यानी पहले ओबीसी मुख्यमंत्री थे। राम नरेश यादव की सरकार में मुलायम सिंह यादव को सहकारिता और पशुपालन विभाग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी गई।
जनता पार्टी में दरार, लोकदल का जन्म
इधर केंद्र में भी जनता दल की सरकार बनी और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन साल भर के भीतर ही जनता पार्टी में दरार दिखाई देने लगी। दरअसल इंदिरा गांधी के खिलाफ लड़ने वाले जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी देसाई के नाम का समर्थन किया था, जिससे चौधरी चरण सिंह नाराज हो गए क्योंकि वे खुद को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहते थे। इसलिए जनता पार्टी ज्यादा दिन तक एकजुट नहीं रह पाई। चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी से अलग होकर लोकदल नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। मुलायम सिंह यादव भी अब चरण सिंह की पार्टी में शामिल हो गए।
1980 में हार, फिर बने लोकदल यूपी अध्यक्ष
1980 में एक बार फिर यूपी में विधानसभा के चुनाव हुए। लेकिन इस बार मुलायम सिंह यादव कांग्रेस पार्टी के बलराम यादव से चुनाव हार गए। यह वही बलराम यादव थे, जिन्हें कभी मुलायम सिंह यादव ने छात्र संघ के चुनावों में हराया था। मुलायम अपनी हार से नाराज थे। वे शाम को बेहद हताश और रोते हुए घर पहुंचे। तभी उन्हें रेडियो से एक खबर मिली कि चौधरी चरण सिंह ने उन्हें लोकदल पार्टी का यूपी अध्यक्ष बना दिया है। इससे मुलायम का दुख कुछ कम हुआ।
वीपी सिंह सरकार और डकैतों पर कार्रवाई
1980 के चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद वीपी सिंह यूपी के मुख्यमंत्री बन गए। उन दिनों यूपी में चंबल के डकैतों का कहर हुआ करता था, इसलिए वीपी सिंह की सरकार ने डकैतों पर नकेल कसने के लिए ऑर्डर निकाल दिए। यूपी पुलिस एक के बाद एक डकैतों का एनकाउंटर कर रही थी।
दावा यह भी किया जाता है कि वीपी सिंह को शक था कि मुलायम की डकैतों से नजदीकी है, जिसके चलते उन्होंने मुलायम के एनकाउंटर का आर्डर भी दे दिया था। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने 1982 में मुलायम सिंह यादव को लोकदल से एमएलसी बना दिया और विधानसभा में लीडर ऑफ अपोजिशन भी बना दिया। इसके बाद मुलायम को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल गया और पुलिस ही उन्हें अब सिक्योरिटी देने लगी।
वीपी सिंह सरकार को घेरा
लीडर ऑफ अपोजिशन बन चुके मुलायम सिंह यादव ने वीपी सिंह सरकार को घेरना शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि वीपी सिंह डकैतों के बहाने पिछड़ों को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने वीपी सिंह के खिलाफ स्टेट लेवल प्रोटेस्ट किए। मुलायम ने एनकाउंटर में मारे गए लोगों की एक लिस्ट तैयार की और राज्यपाल को दिए एक मेमोरेंडम में सीएम को 5000 लोगों की हत्या का जिम्मेदार बताया। मुलायम का दावा था कि इसमें से 418 लोगों को फर्जी एनकाउंटर्स में मारा गया है।
1984 में जानलेवा हमला
मार्च 1984 में मुलायम सिंह यादव पर जानलेवा हमला हुआ। मुलायम रात के वक्त मैनपुरी से अपनी एंबेसडर कार से इटावा वापस लौट रहे थे, तभी उन पर फायरिंग शुरू हो गई। इस हमले में बाइक से आगे चल रहे उनके एक साथी छोटेलाल की गोली लगने से मौत हो गई, जबकि नेत्रपाल सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। बदमाश मुलायम की कार पर लगातार फायरिंग कर रहे थे और कार पर नौ गोलियां लगीं। लेकिन नीचे झुक जाने की वजह से मुलायम सिंह यादव इस हमले में बच गए। इस हमले का आरोप मुलायम के पुराने दुश्मन और कांग्रेस विधायक बलराम यादव पर लगा, जिससे कांग्रेस से मुलायम की दुश्मनी और गहरी हो गई।
1985 में फिर जीत, बने लीडर ऑफ अपोजिशन
1985 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव लोकदल की टिकट पर जसवंत नगर से चुनाव लड़े और जीत गए। इस बार भी लोकदल ने उन्हें विधानसभा में लीडर ऑफ अपोजिशन बना दिया।
लोकदल में दो खेमे, बहुगुणा के साथ गए
1986 में चौधरी चरण सिंह बीमार पड़ गए और पार्टी की कमान हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने हाथों में ले ली। वहीं पार्टी के अंदर एक खेमा चौधरी चरण सिंह के अमेरिका से लौटे बेटे अजीत सिंह को पार्टी का महासचिव बनाने पर उतारू था। इसलिए लोकदल अब दो खेमों में बंट गई—एक हेमवती नंदन बहुगुणा का और दूसरा अजीत सिंह का।
मुलायम सिंह यादव बहुगुणा के खेमे में शामिल हो गए, जिसके चलते अजीत सिंह ने उन्हें विधानसभा में लीडर ऑफ अपोजिशन के पद से हटा दिया। 29 मई 1987 को चौधरी चरण सिंह का निधन हो गया। इसके बाद लोकदल आधिकारिक रूप से दो हिस्सों में बंट गई। एक दल बना लोकदल अजीत और दूसरा लोकदल बहुगुणा। मुलायम सिंह यादव लोकदल बहुगुणा में शामिल हो गए और उन्हें इसका यूपी चीफ भी बना दिया गया।
साधना गुप्ता का जिक्र
इन दिनों मुलायम की जिंदगी में एक और बदलाव आया। पहले से शादीशुदा मुलायम सिंह यादव की जिंदगी में साधना गुप्ता नाम की एक महिला आईं। मुलायम से 20 साल छोटी एक नर्स थीं, जो मुलायम की बीमार मां मूर्ति देवी की देखभाल किया करती थीं। माना जाता है कि साधना ने एक बार मूर्ति देवी की जान बचाई थी, जिसके बाद मुलायम उन पर फिदा हो गए। साधना भी पहले से शादीशुदा थीं और उनका एक साल का बेटा भी था, लेकिन उनकी अपने पति से नहीं बन रही थी। इसलिए साधना गुप्ता ने अपने पति से तलाक ले लिया।
क्रांति रथ यात्रा
इन दिनों जनसंघ पार्टी से भाजपा पार्टी का जन्म हो चुका था। भाजपा के हिंदू बनाम मुस्लिम मुद्दे के सामने मुलायम सिंह यादव ने 14 सितंबर 1987 को कानपुर की अकबरपुर नाम की जगह से अपनी क्रांति रथ यात्रा शुरू कर दी। अकबरपुर इतिहास की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण जगह थी, क्योंकि यहां के हिंदुओं और मुसलमानों ने 1857 की क्रांति में एकजुट होकर ब्रिटिश सेना का सामना किया था। मुलायम की क्रांति रथ यात्रा का संदेश साफ था कि हिंदू और मुस्लिम एक बराबर हैं। यात्रा के दौरान मुलायम सिंह यादव सड़क किनारे गद्दा और तकिया लगाकर ही सो जाते थे।
जनता दल का उदय
इधर भारत की राजनीति बदल रही थी। वीपी सिंह को राजीव गांधी सरकार में मंत्री पद से हटा दिया गया, जिससे वे नाराज होकर कांग्रेस छोड़कर जन मोर्चा नाम से अपनी पार्टी बना लेते हैं। उधर मुलायम सिंह यादव और देवीलाल मिलकर बिखरे हुए विपक्ष को कांग्रेस के खिलाफ एकजुट करना शुरू कर देते हैं। इस तरह 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल पार्टी का उदय होता है, जिसमें विपक्ष की अलग-अलग पार्टियां और नेता एक साथ जुड़ जाते हैं। वीपी सिंह की जन मोर्चा भी जनता दल का हिस्सा बन जाती है और उन्हें जनता दल का अध्यक्ष चुन लिया जाता है।
1989 का चुनाव और यूपी में जनता दल की जीत
1989 का साल मुलायम सिंह यादव की राजनीति का लिटमस टेस्ट था। इस साल जनरल इलेक्शन के साथ यूपी में भी विधानसभा के चुनाव होने जा रहे थे। यह चुनाव देश के लिए एक और मायने में खास थे, क्योंकि यह पहली बार था जब चुनाव में सेकुलर और कम्युनल बेसिस पर वोट मांगे जा रहे थे। जहां भाजपा हिंदुत्व की राजनीति खुलकर कर रही थी, वहीं गैर-भाजपा पार्टियां सेकुलर पॉलिटिक्स कर रही थीं।
मुलायम सिंह यादव ने यूपी चुनाव प्रचार में अपनी पूरी जान लगा दी। मुलायम की मेहनत के दम पर जनता दल को यूपी में 85 में से 54 लोकसभा की सीटें मिलीं और विधानसभा की 425 में से 208 सीटों पर जनता दल जीती। इस चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने अपने इंटर कॉलेज के इंग्लिश टीचर उदय प्रताप सिंह को भी मैनपुरी से लोकसभा का टिकट दिलवाया, जिसे जीतकर वे लोकसभा सांसद बन गए।
वीपी सिंह बने पीएम, यूपी में सीएम की खींचतान
इधर केंद्र में बहुमत हासिल करने के बाद जनता दल के वीपी सिंह भारत के नए प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन उत्तर प्रदेश में जनता दल से सीएम पद के दो दावेदार थे। पहले थे चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह और दूसरे थे मुलायम सिंह यादव। वहीं प्रधानमंत्री वीपी सिंह चौधरी अजीत सिंह को सीएम बनाने के पक्ष में थे।
वीपी सिंह ने सीएम पद को लेकर चल रही खींचतान के निपटारे के लिए तीन ऑब्जर्वर का एक दल यूपी भेज दिया। यह दल अजीत सिंह का नाम तय करके आया था और उनके नाम की घोषणा वाली चिट्ठी पड़ने ही वाली थी। तभी मुलायम सिंह यादव ने उन्हें बीच में ही रोक दिया और कहा कि आप चुनाव कराने आए हैं तो निष्पक्ष होकर चुनाव कराएं। ज्यादातर विधायक मुलायम सिंह यादव के फेवर में थे, इसलिए अंततः सीएम के लिए उन्हीं के नाम की घोषणा कर दी गई।
पहली बार बने मुख्यमंत्री
इस तरह कभी पहलवानी में जोर आजमाने वाले मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बन गए। मुलायम सिंह यादव को सीएम बनाने में जनता दल के नेता शरद यादव की भी अहम भूमिका मानी जाती है, क्योंकि उन्होंने ही अजीत सिंह को समझाया था। माना जाता है कि शरद यादव ने यह एहसान इसलिए उतारा, क्योंकि 1986 में मुलायम ने शरद यादव को राज्यसभा भेजने में और फिर 1989 में बदायूं से लोकसभा चुनाव की टिकट दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसकी बदौलत शरद यादव संसद पहुंच सके थे।









