पर्यावरणीय चुनौतियों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं, वैश्विक चर्चा जरूरी: CJI सूर्यकांत

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की ओर से पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुद्दों पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की पहल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मंच अलग-अलग देशों के विशेषज्ञों को विचारों और बेहतर तरीकों को साझा करने का अवसर देते हैं।

पर्यावरणीय मुद्दों पर वैश्विक मंथन जरूरी

“द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से इतर ANI से बातचीत में CJI सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरणीय चुनौतियां भौगोलिक सीमाओं से परे हैं। इसलिए इनसे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित चर्चा जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हितधारक, विषय विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और अन्य प्रतिष्ठित लोग एक साथ आते हैं और अलग-अलग देशों में इन समस्याओं से निपटने के तरीकों तथा सर्वोत्तम प्रथाओं पर विचार साझा करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण भारतीय सभ्यता का हिस्सा

सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण भारत की सभ्यतागत परंपरा में गहराई से निहित है और संविधान में भी इसे महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(g) का उल्लेख करते हुए कहा कि संवैधानिक व्यवस्था पर्यावरण की रक्षा के लिए राज्य और नागरिकों, दोनों की जिम्मेदारी को दर्शाती है।

स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों के दौरान पर्यावरण संबंधी कानूनों और न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण ढांचा विकसित किया है। अदालत ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है।

उन्होंने न्यायिक फैसलों के जरिए विकसित कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों का भी उल्लेख किया, जिनमें सावधानी का सिद्धांत (Precautionary Principle), प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle), पूर्ण दायित्व (Absolute Liability) और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) शामिल हैं।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

CJI सूर्यकांत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण को विकास में बाधा के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने सतत विकास की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि विकास संबंधी गतिविधियां लोगों और पर्यावरण के प्रति जवाबदेह रहनी चाहिए।

उन्होंने अदालत के बदलते दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया और कहा कि ecocentric proportionality के तहत पर्यावरण संरक्षण को मजबूत बनाए रखते हुए व्यावहारिक परिस्थितियों और संभावित भविष्य की स्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पर्यावरणीय न्यायशास्त्र का दायरा बढ़ा

CJI ने कहा कि पर्यावरणीय न्यायशास्त्र अब केवल नुकसान को रोकने तक सीमित नहीं रहा है। इसमें विशेषज्ञों की निगरानी, पर्यावरण की बहाली, मुआवजा और जवाबदेही जैसे पहलू भी शामिल हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में होने वाली चर्चाएं उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों को समझने में मदद कर सकती हैं और विभिन्न देशों में अपनाए जा रहे तरीकों को साझा करने का अवसर प्रदान कर सकती हैं।

कई देशों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा

NGT के इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायाधीशों, न्यायिक सदस्यों, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों, अधिवक्ताओं और कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण कानून, पर्यावरणीय शासन और पर्यावरणीय न्याय जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।

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