उन्नाव में जर्जर स्कूल की तस्वीर ने खोली सरकारी दावों की पोल, 36 बच्चे खंडहरनुमा भवन में पढ़ने को मजबूर

उनका कहना है कि स्कूल के निर्माण को लेकर विवाद अब भी न्यायालय में लंबित है, जिसकी वजह से विकास कार्य रुके हुए हैं

उन्नाव जिले से सामने आई एक चौंकाने वाली तस्वीर ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है। एक ओर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और स्कूलों के कायाकल्प पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते है, वहीं दूसरी ओर यहां के मासूम बच्चे आज भी जर्जर और खंडहरनुमा स्कूल में पढ़ने को मजबूर हैं।

यह मामला उन्नाव जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर पुरवा विधानसभा क्षेत्र के बसनोहा गांव का है, जहां स्थित प्राथमिक विद्यालय की हालत बेहद दयनीय है। स्कूल का भवन खंडहर में तब्दील हो चुका है। दीवारें तो खड़ी हैं, लेकिन छत पूरी तरह गायब है। जो दीवारें बची भी हैं, वे इतनी जर्जर हो चुकी हैं कि कभी भी हादसे का कारण बन सकती हैं।

इस स्कूल में करीब 36 बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने आते हैं। गर्मी के मौसम में ये बच्चे बिना पंखे के बरामदे में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, जबकि धूप से बचने के लिए स्कूल परिसर में मौजूद एकमात्र नीम के पेड़ का सहारा लेते हैं। बारिश के दिनों में स्थिति और भी खराब हो जाती है, जब कच्चे रास्तों से होकर स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है और बच्चों को अपनी किताबों को भीगने से बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘कायाकल्प’ और ‘कंपोजिट ग्रांट’ जैसे योजनाओं के बावजूद इस विद्यालय में पिछले लगभग 15 वर्षों से कोई ठोस निर्माण कार्य नहीं हुआ है। गांव के लोगों का कहना है कि कई बार अधिकारियों, जिलाधिकारी और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को शिकायत दी गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला।

गांव के प्रधान संदीप चौधरी ने भी इस स्थिति पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि स्कूल के निर्माण को लेकर विवाद अब भी न्यायालय में लंबित है, जिसकी वजह से विकास कार्य रुके हुए हैं और इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है।

स्थिति यह है कि अब अभिभावक भी अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजने से कतराने लगे हैं। पहले जहां इस विद्यालय में 57 बच्चे पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर मात्र 36 रह गई है और लगातार कम होती जा रही है।

स्कूल के गेट पर लगा शिलापट्ट भले ही विकास के दावे करता हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। यह पूरा मामला शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों और प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है।

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